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Showing posts from May, 2020

कबीर साहेब चारों युगों में प्रकट होते है

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 गौरी शंकर और सरस्वती नाम के ब्राह्मण दंपति थे। ये भगवान शिव के पुजारी थे। भगवान शिव की महिमा शिव पुराण से निःस्वार्थ भाव से भक्तात्माओं को कथा सुनाया करते थे। किसी से पैसा नहीं लेते थे। इतने नेक आत्मा थे कि यदि कोई उनको अपने आप दक्षिणा दे जाता था, उसमें से अपने भोजन के लिए रख लेते थे और जो बच जाता था उसका भण्डारा कर देते थे। अन्य स्वार्थी ब्राह्मण गौरी शंकर तथा सरस्वती से इर्ष्या रखते थे क्योंकि गौरी शंकर निस्वार्थ कथा किया करते थे। पैसे के लालच में भक्तों को गुमराह नहीं करते थे, जिस कारण से प्रशंसा के पात्रा बने हुए थे। उधर से मुस्लमानों को ज्ञान हो गया कि इनके साथ कोई हिन्दू, ब्राह्मण नहीं है। उन्होंने इसका लाभ उठाया और बलपूर्वक उनको मुस्लमान बना दिया। मुस्लमानों ने अपना पानी उनके सारे घर में छिड़क दिया तथा उनके मुँह में भी डाल दिया, सारे कपड़ों पर छिड़क दिया। उससे हिन्दू ब्राह्मणों ने कहा कि अब ये मुस्लमान बन गए हैं। आज के बाद इनका हमारे से कोई भाई-चारा नहीं रहेगा। हिन्दुओं ने अपने समाज से निकाल दिया। रोजी रोटी की समस्या हुई तो इन्होंने जुलाहे का कार्य शुरू कर दिया क्योंकि इसमे...

प्राकृतिक आपदा ओर उन्मूलन

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प्रकृति में बाढ़, सूखा, भूकम्प, सुनामी जैसी अचानक आपदा आती ही रहती हैं और इनके कारण जन और सम्पत्ति का बहुत नुकसान होता  है। अतः यह बहुत महत्त्वपूर्ण है कि इन प्राकृतिक आपदाओं का सामना करने और जहाँ  सम्भव हो इन आपदाओं को कम से कम करने के उपाय और साधन खोजे जाएँ। कुछ हमारी कमी के द्वारा होने वाली आपदा भी विनाशकारी ओर प्राकृतिक  की तरह उन्हीं के समान  नुकसान  होता है प्राकृतिक आपदाओं के साथ ही मानव निर्मित आपदाओं के भी कारण, प्रभाव, रोकथाम और प्रबन्धन के विषय में जानकारी प्राप्त करेंगे। पौधा रोपण को बढ़ावा दिया जाना चाहिए ओर कटाई पर नजर रखी जाए। जलग्रहण वाले जगह पर पेड़ो की कटाई एकदम नहीं होना चाहिये। पेड़ कटने से पानी बहुत अधिक तीव्रता से बहता है और पानी के साथ मिट्टी बहने से मृदा-अपरदन बहुत होता है। इससे नदियों में गाद जमने का मुख्य कारण है और नदियों में गाद जमने से बाढ़ों की सम्भावना बहुत बढ़ जाती है। ऐसे निर्माण कार्य की जिसके कारण जल निकास बाधित हो, कभी अनुमति नहीं मिलनी चाहिए। अचानक आये पानी के निकास की नालियों के ऊपर अतिक्रमण नहीं होना चाहिये। इन सबसे...

पर्यावरण का महत्व और बचाव कार्य

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सामान्य अर्थों में पर्यावरण (परि+आवरण) जो हमारे चारों तरफ आवरण है यह हमारे जीवन को प्रभावित करता है यह हमारे चारों ओर व्याप्त है और हमारे जीवन की प्रत्येक घटना इसी पर निर्भर करती और संपादित होती हैं। मनुष्यों द्वारा की जाने वाली समस्त क्रियाएं  पर्यावरण को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करती हैं।  इस प्रकार किसी जीव और पर्यावरण के बीच का संबंध भी होता है, हमारा जीवन बहुत कुछ प्रकृति पर निर्भर करता है । पर्यावरण के बिना जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती चाहे मनुष्य हो पशु पक्षी एव छोटे बड़े जीव जंतु सबका आधार पर्यावरण ही है {"uid":0.37829337702571997,"hostPeerName":"https://m--hindi-webdunia-com.cdn.ampproject.org","initialGeometry":"{\"windowCoords_t\":0,\"windowCoords_r\":360,\"windowCoords_b\":702,\"windowCoords_l\":0,\"frameCoords_t\":2755.5,\"frameCoords_r\":181,\"frameCoords_b\":2756.5,\"frameCoords_l\":180,\"posCoord...

शास्त्र विरूद्ध साधना से नास्तिकता की ओर

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अनादि काल से ही मनुष्य शांति, ओर सुख  की खोज में लगा हुआ है। लेकिन उसकी यह चाहत कभी पूर्ण नहीं हो पाई। ऐसा इसलिए है कि उसे इस चाहत को प्राप्त करने के मार्ग का पूर्ण ज्ञान नहीं है। सभी प्राणी चाहते हैं कि कोई कार्य न करना पड़े, खाने को स्वादिष्ट भोजन मिले, पहनने को सुन्दर वस्त्रा मिलें, रहने को आलीशान मकान हों,खेलें-कूदें, मौज-मस्ती मनांए और कभी बीमार न हों, कभी बूढ़े न हों और कभी मृृत्यु न होवे आदि-2, परंतु जिस संसार में हम रह रहे हैं यहां न तो ऐसा कहीं पर नजर नहीं आता है क्योंकि यह लोक नाशवान है, इस लोक की हर वस्तु भी नाशवान है और इस लोक का राजा ब्रह्म काल है जो एक लाख मानव सूक्ष्म शरीर खाता है। उसने सब प्राणियों को शास्त्र विरूद्ध साधना पर लगा दिया व पाप-पुण्य रूपी जाल में उलझा कर तीन लोक के पिंजरे में कैद किए हुए है।  आज सर्व भक्त समाज धर्म गुरू समाज सेवी संस्थाएं शास्त्राविधि को छोड़ कर मनमानी पूजा अर्चना करा रहे है यानि अज्ञान के कारण शास्त्र विरूद्ध साधना से भक्ति करने वाले का अनमोल मानव (स्त्रा-पुरूष का) जीवन नष्ट हो रहा है क्योंकि पवित्रा श्रीमद्भगवत गीता अ...

सृष्टि की उत्पत्ति कैसे हुई

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#सृष्टि_रचना अकाल पुरुष काहू नहिं चीन्हां।  काल पाय सबही गह लीन्हां।।  ब्रह्म काल सकल जग जाने।  आदि ब्रह्मको ना पहिचाने।।  तीनों देव और औतारा।  ताको भजे सकल संसारा।।  तीनों गुणका यह  विस्त्तारा।  धर्मदास मैं कहों पुकारा।।  गुण तीनों की भक्ति में, भूल परो संसार।  कहै कबीर निज नाम बिन, कैसे उतरैं पार।।  उपरोक्त अमृतवाणी में परमेश्वर कबीर साहेब जी अपने निजी सेवक श्री धर्मदास साहेब जी को कह रहे हैं कि धर्मदास यह सर्व संसार तत्वज्ञान के अभाव से विचलित है। किसी को पूर्ण मोक्ष मार्ग तथा पूर्ण सृष्टी रचना का ज्ञान नहीं है। इसलिए मैं आपको मेरे द्वारा रची सृष्टी की कथा सुनाता हूँ। बुद्धिमान व्यक्ति तो तुरंत समझ जायेंगे। परन्तु जो सर्व प्रमाणों को देखकर भी नहीं मानेंगे तो वे नादान प्राणी काल प्रभाव से प्रभावित हैं, वे भक्ति योग्य नहीं। अब मैं बताता हूँ तीनों भगवानों (ब्रह्मा जी, विष्णु जी तथा शिव जी) की उत्पत्ति कैसे हुई? इनकी माता जी तो अष्टंगी (दुर्गा) है तथा पिता ज्योति निरंजन (ब्रह्म, काल) है। पहले ब्रह्म की उत्पत्ति अण्डे से ह...

सच्चा संकट मोचन

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देश ऐसी स्थिति से गुजर रहा है की लोग अपने अपने घरो में बंद हैं । गरीब ओर मजदूर को तो भूखे मरने की नौबत आ गई है । ऐसे संकट के समय में संत रामपाल जी महाराज के शिष्यों द्वारा शुरू किया एक और अभियान देश के कोने कोने में भूखे लोगों को भोजन देने का कार्य शुरू किया

Allah_Not_Allowed_EatMeat

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 कबीर परमात्मा कहते हैं माँस तो कुत्ते का आहार है, मनुष्य शरीर धारी के लिए वर्जित है। हमें मांस नहीं खाना चाहिए ये महापाप है कबीर-यह कूकर को भक्ष है, मनुष देह क्यों खाय। मुखमें आमिख मेलिके, नरक परंगे जाय।। अवश्य देखें साधना टीवी शाम 7:30 से 8:30 तक

नशा करता है नाश

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नशा हमारे शरीर के लिए बहुत नुकसानदायक है इसे त्यागने में ही भलाई है। भविष्य भी अंधकार में होता है  ऐसे व्यक्ति की ना तो समाज में इज्जत होती है और ना ही घर में रिश्तेदारों में होती है