शास्त्र विरूद्ध साधना से नास्तिकता की ओर
अनादि काल से ही मनुष्य शांति, ओर सुख की खोज में लगा हुआ है। लेकिन उसकी यह चाहत कभी पूर्ण नहीं हो पाई। ऐसा इसलिए है कि उसे इस चाहत को प्राप्त करने के मार्ग का पूर्ण ज्ञान नहीं है। सभी प्राणी चाहते हैं कि कोई कार्य न करना पड़े, खाने को स्वादिष्ट भोजन मिले, पहनने को सुन्दर वस्त्रा मिलें, रहने को आलीशान मकान हों,खेलें-कूदें, मौज-मस्ती मनांए और कभी बीमार न हों, कभी बूढ़े न हों और कभी मृृत्यु न होवे आदि-2, परंतु जिस संसार में हम रह रहे हैं यहां न तो ऐसा कहीं पर नजर नहीं आता है क्योंकि यह लोक नाशवान है, इस लोक की हर वस्तु भी नाशवान है और इस लोक का राजा ब्रह्म काल है जो एक लाख मानव सूक्ष्म शरीर खाता है। उसने सब प्राणियों को शास्त्र विरूद्ध साधना पर लगा दिया व पाप-पुण्य रूपी जाल में उलझा कर तीन लोक के पिंजरे में कैद किए हुए है।
आज सर्व भक्त समाज धर्म गुरू समाज सेवी संस्थाएं शास्त्राविधि को छोड़ कर मनमानी पूजा अर्चना करा
रहे है यानि अज्ञान के कारण शास्त्र विरूद्ध साधना से भक्ति करने वाले का अनमोल मानव (स्त्रा-पुरूष का) जीवन नष्ट हो रहा है क्योंकि पवित्रा श्रीमद्भगवत गीता अध्याय 16 श्लोक 23 में बताया है कि :- जो साधक शास्त्राविधि को त्यागकर अपनी इच्छा से मनमाना आचरण करता है यानि किसी को देखकर या किसी के कहने से भक्ति साधना करता है तो उसको न तो कोई सुख प्राप्त होता है, न कोई सिद्धि यानि भक्ति की शक्ति प्राप्त होती है, न उसकी गति होती है। इन्हीं तीन लाभों के लिए साधक साधना करता है जिस कारण से समाज नास्तिक होता जा रहा हैं
गीता अध्याय 16 श्लोक 24 :- इसमें स्पष्ट किया है कि ‘‘इससे तेरे लिए अर्जुन! कर्तव्य यानि जो भक्ति क्रियाऐं करनी चाहिए तथा अकर्तव्य यानि जो भक्ति क्रियाऐं नहीं करनी चाहिए, की व्यवस्था में शास्त्रों में वर्णित भक्ति क्रियाऐं ही प्रमाण है यानि शास्त्रों में बताई साधना कर। आज शास्त्र अनुकूल साधना केवल संत रामपाल जी महाराज के पास ही है। आप से विनती है
कि उनसे दीक्षा लेकर अपना व परिवार का कल्याण करवाए व शास्त्रा विपरीत साधना कर रहे हो, उसे तुरंत त्याग दो।
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