कबीर साहेब चारों युगों में प्रकट होते है

 गौरी शंकर और सरस्वती नाम के ब्राह्मण दंपति थे। ये भगवान शिव के पुजारी थे। भगवान शिव की महिमा शिव पुराण से निःस्वार्थ भाव से भक्तात्माओं को कथा सुनाया करते थे। किसी से पैसा नहीं लेते थे। इतने नेक आत्मा थे कि यदि कोई उनको अपने आप दक्षिणा दे जाता था, उसमें से अपने भोजन के लिए रख लेते थे और जो बच जाता था उसका भण्डारा कर देते थे। अन्य स्वार्थी ब्राह्मण गौरी शंकर तथा सरस्वती से इर्ष्या रखते थे क्योंकि गौरी शंकर निस्वार्थ कथा किया करते थे। पैसे के लालच में भक्तों को गुमराह नहीं करते थे, जिस कारण से प्रशंसा के पात्रा बने हुए थे। उधर से मुस्लमानों को ज्ञान हो गया कि इनके साथ कोई हिन्दू, ब्राह्मण नहीं है। उन्होंने इसका लाभ उठाया और बलपूर्वक उनको मुस्लमान बना दिया। मुस्लमानों ने अपना पानी उनके सारे घर में छिड़क दिया तथा उनके मुँह में भी डाल दिया, सारे कपड़ों पर छिड़क दिया। उससे हिन्दू ब्राह्मणों ने कहा कि अब ये मुस्लमान बन गए हैं। आज के बाद इनका हमारे से कोई भाई-चारा नहीं रहेगा। हिन्दुओं ने अपने समाज से निकाल दिया। रोजी रोटी की समस्या हुई तो इन्होंने जुलाहे का कार्य शुरू कर दिया क्योंकि इसमें धन की आवश्कता नहीं होती थी इसलिए जुलाहे कहलाए
हिन्दू ब्राह्मणों ने नीरू-नीमा का गंगा घाट पर गंगा नदी में स्नान करना बंद कर दिया था। कहते थे कि अब तुम मुसलमान हो गए हो। गंगा नदी का ही पानी लहरों के द्वारा उछल कर लहरतारा नामक बहुत बड़े तालाब को भर देता था। बहुत निर्मल जल भरा रहता था। उसमें कमल के फूल उगे हुए थे। सन्  1398  (विक्रमी संवत्  1455) ज्येष्ठ मास शुद्धि पूर्णमासी को ब्रह्ममूहूर्त (सूर्योदय से लगभग डेढ़ घण्टा पहले) में अपने सत्यलोक (ऋतधाम) से सशरीर आकर परमेश्वर कबीर (कविर्देव) बालक रूप बनाकर लहर तारा तालाब में कमल के फूल पर विराजमान हुए। उसी लहर तारा तालाब पर नीरू-नीमा सुबह-सुबह ब्रह्ममुहुर्त में स्नान करने के लिए प्रतिदिन जाया करते थे। (ब्रह्ममुहुर्त कहते हैं सूर्योदय होने से डेढ घण्टा पूर्व) एक बहुत तेजपुंज का चमकीला गोला (बालक रूप में परमेश्वर कबीर साहेब जी तेजोमय शरीर युक्त आए थे, दूरी के कारण प्रकाश पुंज ही नजर आता है) ऊपर से (सत्यलोक से) आया और कमल के फूल पर सिमट गया। जिससे सारा लहर तारा तालाब जगमग-जगमग हो गया था और फिर एक कोने में जाकर वह अदृश्य हो गया। 
नीरू व नीमा प्रतिदिन की तरह उस दिन भी स्नान करने जा रहे थे। रास्ते में नीमा ने प्रार्थना की कि हे भगवान शिव (क्योंकि वे भले ही मुस्लमान बन गए थे लेकिन अपनी वह साधना हृदय से नहीं भूल पा रहे थे जो इतने वर्षों से कर रहे थे।) क्या आपके घर में हमारे लिए एक बच्चे की कमी पड़ गई? हमेंं भी एक लाल दे देते, हमारा जीवन भी सफल हो जाता। ऐसा कहकर फूट-फूट कर रोने लगी। उसके पति नीरू ने कहा कि नीमा प्रभु की इच्छा पर प्रसन्न रहने में ही हित होता है। यदि ऐसे रोती रहेगी तो तेरा शरीर कमजोर हो जायेगा, आँखों से दिखना बंद हो जायेगा। हमारे भाग्य में संतान नहीं है। ऐसे कहते-कहते लहर तारा तालाब पर पहुँच गए। थोड़ा-थोड़ा अंधेरा था। नीमा स्नान करके बाहर आई। अपने कपड़े बदले। नीरू स्नान करने के लिए तालाब में प्रवेश करके गोते मार-मार कर नहाने लगा। नीमा जब स्नान करते समय पहना हुआ कपड़ा धोने के लिए दोबारा तालाब के किनारे पर गई, तब तक अंधेरा हट गया था। सूर्य उदय होने वाला ही था। नीमा ने तालाब में देखा कि सामने कमल के फूल पर कोई वस्तु हिल रही है। कबीर साहेब ने बच्चे के रूप में एक पैर का अँगूठा मुख में दे रखा था और एक पैर को हिला रहे थे। पहले तो नीमा ने सोचा कि शायद कोई सर्प न हो और मेरे पति की तरफ आ रहा हो। फिर ध्यान से देखा तो समझते देर न लगी कि ये तो कोई बच्चा है। बच्चा और कमल के फूल पर। एकदम अपने पति को आवाज लगाई कि देखना जी बच्चा डूबेगा, बच्चा डूबेगा। नीरू बोला कि नादान तू बच्चों के चक्कर में पागल हो गई है। पानी में भी तुझे बच्चा नजर आने लगा। नीमा ने कहा हाँ, वह सामने कमल के फूल पर देखो। नीमा की जोरदार आवाज से प्रभावित होकर जिस तरफ हाथ से संकेत कर रही थी नीरू ने उधर दे खा सचमुु बालक है नीरू ने फूूल सहित निमा को दे दिया बालक पाकर नीमा बहुत प्यार कर रही थी तथा शिव प्रभु की प्रसंशा तथा स्तुति कर रही थी कि हे प्रभु आपने मेरी वर्षों की मनोकामना पूर्ण कर दी। (क्योंकि वह शिव की पुजारिन थी।) कह रही थी हे शिव प्रभु आज ही हृदय से पुकार की थी, आज ही सुन ली। उस कबीर परमेश्वर को लेकर अपने घर आए थे

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