आत्महत्या सही या गलत
आत्म_हत्या_सही_या_गलत
पहली बात तो यह कि आत्महत्या करना बहुत ही गलत है। आत्मा की किसी भी रीति से हत्या नहीं की जा सकती। हत्या होती है शरीर की। इसे स्वघात कह सकते हैं। दूसरों की हत्या से ब्रह्म दोष लगता है लेकिन खुद की ही देह की हत्या करना बहुत बड़ा अपराध है। जिस देह ने आपको कितने भी वर्ष तक इस संसार में रहने की जगह दी। संसार को देखने, सुनने और समझने की शक्ति दी। जिस देह के माध्यम से आपने अपनी प्रत्येक इच्छाओं की पूर्ति की और सबसे महत्व पूर्ण बात ये कि इस मानव शरीर से हम भक्ति करके अपना मोक्ष कर सकते है। ईश्वर ने ये गुण सिर्फ मनुष्य के शरीर में ही दिया है जो अपने जन्म मरण के चक्र को मिटा सकता है।उस देह की हत्या करना बहुत बड़ा अपराध है। जरा सोचिए इस बारे में। आपका कोई सबसे खास, सगा या अपना कोई है तो वह है आपकी देह।
वैदिक ग्रंथों में आत्मघाती दुष्ट मनुष्यों के बारे में कहा गया है:-
असूर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसावृता।
तास्ते प्रेत्यानिभगच्छन्ति ये के चात्महनो जना:।।
अर्थात: आत्मघाती मनुष्य मृत्यु के बाद अज्ञान और अंधकार से परिपूर्ण, सूर्य के प्रकाश से हीन, असूर्य नामक लोक को गमन कहते हैं।
गरूड़ पुराण में जीवन और मृत्यु के हर रूप का वर्णन किया गया है। आत्महत्या को निंदनीय कर्म माना जाता है, क्योंकि धर्म के अनुसार 84 लाख योनियों के बाद मानव जीवन मिलता है ऐसे में उसे व्यर्थ गंवा देना मूर्खता और अपराध है।
कहते हैं कि जो व्यक्ति आत्महत्या करता है उसकी आत्मा हमारे बीच ही भटकती रहती है, न ही उसे स्वर्ग/नर्क में जाने को मिलता है न ही वह जीवन में पुन: आ पाती है। ऐसे में आत्मा अधर में लटक जाती है। ऐसे आत्मा को तब तक ठिकाना नहीं मिलता जब तक उनका समय चक्र पूर्ण नहीं हो जाता है। इसीलिए आत्महत्या करने के बाद जो जीवन होता है वो ज्यादा कष्टकारी होता है।
यदि आत्महत्या करने वाला व्यक्ति अत्यन्त विवश होकर आत्महत्या कर रहा है तो उसकी कोई इच्छा अधूरी रह गई है या वह गहरे तनाव के कारण ऐसा कर रहा है। ऐसी आत्मा की मुक्ति मुश्किल होती है। मुक्ति का अर्थ है या तो नया शरीर मिल जाए या मोक्ष मिल जाए। संतों तक को मोक्ष नहीं मिलता तो सामान्य की बात अलग है। अत: परेशान या अतृप्त आत्मा मुक्ति नहीं हो पाती और वह भूत, प्रेत या पिशाच जैसी योनि धारण कर भटकती रहती है। वह कम से कम तब तक भटकती है जब तक की उसके मृत शरीर की निर्धारित उम्र पूर्ण नहीं हो जाती या फिर श्राद्ध, तर्पण आदि धार्मिक कार्य से उसे मुक्ति नहीं मिलती।
कबीर साहेब मनुष्य के एक श्वास की कीमत बताई है
कहता हूं कहीं जात हू कहूं बजा के ढोल।
एक श्वास जो खाली जात है तीन लोक का मोल।।
एक श्वास की कीमत स्वर्ग, धरती, ओर पाताल लोक की जितनी कीमत तो एक श्वास की है। आप अंदाजा नहीं लगा सकते पूरे जीवन की कितनी कीमत है ओर आत्म हत्या करके इसे खत्म कर दिया। ऋषि मुनियों ने इस शरीर से ही अपने अन्दर शक्तियां प्राप्त की थी।आप भी सत् भक्ति करके मोक्ष प्राप्त कर सकते है।
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